सीएसआर फंड का बंदरबांट

 आज बात करते है ईसीएल की जी हां वही ईसीएल प्रबंधन जिसके अधीन चित्रा कोलियरी आता है वहीं प्रबंधन को सलाना राज्य सरकार को करोड़ों रुपए रॉयल्टी देती है वहीं प्रबंधन जो सीएसआर और डिस्ट्रिक्ट माइनिंग फंड से विकास नाम पर विस्थापित क्षेत्रों में फंड के राशि खर्च करने का दावा करती है पर क्या यह विकास सही मायने में जमीनी स्तर पर क्रियान्वित होती है या फिर महज कागजों तक ही सीमित रह जाती है?

पिछले कई सालों से अखबारों के माध्यम से चित्रा के विकास के बारे में कई खबरों को पढ़ा और सुना पर वास्तविकता यहीं है कि दशको बित जाने के बाद भी आज भी विस्थापित क्षेत्रों में फंड का सही तरीके से उपयोग नहीं किया गया।(कुछ अपवादों को छोड़ कर) आज भी महज कुछ क्षेत्रों में टैंकर के माध्यम से पानी मुहैया कराया जाता है जो नियमित रूप से नहीं चलता है(खून बस्ती उदहारण)(वैसे अगर सरकारी विभागों से कराया गया पेयजल सुविधा को छोड़ दे तो इस क्षेत्र में प्रबन्धन ने कोई कार्य नहीं किया है), प्रबंधन चाहता तो हर विस्थापित गांवाे में पाइपलाइन के माध्यम से माइंस का पानी हर तालाब में उपलब्ध करा सकता था लेकिन नहीं किया, सीएसआर फंड द्वारा किए जा रहे ज्यादातर खर्च चित्रा के कॉलोनी तक ही सीमित है वहीं कॉलोनी जहां प्रबंधन के बड़े बड़े अधिकारी रहते है वहीं कॉलोनी जहां नाम मात्र विस्थापित निवास करते है, शायद यही कारण है कि फंड के पैसों का खर्च गांवो में नहीं होता है, पानी सप्लाई होता है तो सिर्फ कॉलोनी में, कॉलोनी में हर साल नालों की सफाई होती है और गांवो में तो सड़के ही नाली का कार्य करती है, कॉलोनी में मच्छरों को मारने के लिए फॉगिंग होती है और विस्थापित क्षेत्रों के लोग मच्छरों के प्रकोप से मलेरिया जैसे बीमारी से पीड़ित हो जाते है, कचरे का उठाव सिर्फ़ कॉलोनी से होता है जहा बायोडिग्रेडेबल और नॉन बायोडिग्रेडेबल का उठाव एक साथ होता है  कॉलोनी के हर सेक्टर में न किसी प्रकार का डस्टबिन उपलब्ध है और न ही कचरे का उठाव सही समय में होता है कचरे को डिस्पोज करने का भी ठोस नीति प्रबंधन के पास नहीं है वहीं विस्थापित क्षेत्रों में न कचरे का उठाव होता और न ही कचरे को डिस्पोज करने का कोई स्थान बना हुआ है, प्रबन्धन न एक सही स्थान पर टहलने के लिए पार्क बनवा पाया(बस पुराने पार्क की मरम्मत हर साल करवा देते है जहा कोई नहीं जाता है {कारण प्रदूषण}) और न ही आधुनिक खेल सामग्री से लेज एक स्टेडियम का निर्माण करा पाया, चित्रा के सड़कों के बारे में तो जग जाहिर है खैर इन सारी विकास की बातों के समक्ष पर्यावरण के मुद्दे गौण हो जाते है कोयला निकालने के क्रम में न जाने कितने पेड़ो की आहुति दी गई होगी खैर उनके स्थान पर लगाए गए कई पेड़ पोधे रख रखाव के अभाव में विलुप्त हो गई है और महज नाम मात्र पेड़ बचे हुए हैं(उदहारण जमुआ जंगल) हर साल प्रबंधन द्वारा विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर कई पोधे लगाने और कई दिनों तक पखवाड़े चला कर जागरूकता अभियान और सफाई अभियान चलाने की बात की जाती किंतु वास्तविक में यह सब खाना पूर्ति है वास्तविकता यही है कि यह अभियान महज कोलियरी के परिसर तक ही सीमित रहती है जहां नाम मात्र पोेधे लगाए जाते है जो देख रेख़ के अभाव में अगले साल तक खत्म हो जाते है और पुनः उसी स्थान पर नए पॊधे को रोपा जाता है। स्वास्थ सुविधा की बात करे तो महज एक डॉक्टर के भरोसे अस्पताल चल रहा है जहा न दवाई की पूरी उपलब्धता है और न ही आधुनिक स्वास्थ संरचना, वहीं शिक्षा के क्षेत्र में भी प्रबन्धन फेल नज़र आता है अगर वे चाहते तो क्षेत्र के सरकारी स्कूलों में  आधुनिक पठन पाठन के सामग्री उपलब्ध करा सकते थे किन्तु उन्होंने इसे अपनी जिम्मेदारी नहीं समझी।   वैसे जिनके पास दो एकड़ जमीन नहीं है उनको महज पैसे नुमा लोलीपॉप देकर शांत करने की कोशिश की जाती है और किंतु उनको अन्य लाभ से वंचित रखा जाता है , कुल मिला कर यहीं कहा जा सकता है की कोलियरी प्रबन्धन मस्त है और विस्थापित लोग त्रस्त है, जमीन देने वाले कई आज भी मुवाजे के लिए दरबदर भटक रहे है वहीं जमीन से कोयला निकालने वाले बड़े बाबू मस्त एसी की हवा खा रहे है लोग गंदगी, मच्छरों के प्रकोप, मूल भूत स्वास्थ सुविधा, प्रदूषण से लड़ रहे हैं वहीं प्रबंधन चैन की नींद सो रहा है । प्रबंधन अगर सीएसआर फंड को ग्राम सभा के अधीन छोड़ दे और उनको इस बात का निर्णय लेने की छूट दे की इस फंड का कहा और किस प्रकार से खर्च किया है ग्राम सभा को विकास कार्य करने का जिम्मेदारी सौंपा जाए तो फिर सीएसआर फंड का बंदरबांट बंद हो जाएगा लेकिन प्रबन्धन ऐसा नहीं करेगा क्यों की फिर ठेकेदारों की कमाई बंद हो जाएगी और प्रबन्धन के अधिकारियों कि कमिशन खोरी भी बंद हो जाएगी ऐसे में यह समझौता घाटे का प्रतीत होता नजर आता है। वैसे पांचवीं और छठी अनुसूची और पेसा कानून 1996 में आने वाले राज्यो में ये प्रावधान है और यह अधिकार संविधान  में लिखित रूप से मौजूद है किन्तु धरातल पे ये अधिकार लागू नहीं हुआ है।

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