बिहार चुनाव
बिहार जो कभी सम्पूर्ण भारत की राजनीति का केंद्र हुआ करती थी आज पुनः उसी राज्य की राजनीति सत्ता कि गलियारों में केंद्र बिंदु बना हुए है आखिर क्यों? क्यों की कोविड महामारी के बीच बिहार विधानसभा चुनाव के परिणाम की घोषणा कल होने वाली है, सारे समाचार चैनलों के एग्जिट पोल के नतीजे महागठबंधन की सरकार बनने का दावा कर रही है, खैर इनके दावे कभी कभार गलत भी साबित हुई है।
बहरहाल इस विधानसभा चुनाव लगभग छ: से ज्यादे लोग मुख्यमंत्री पद के उम्मीवार थे। एनडीए के तरफ से नीतीश कुमार यूपीए के तरफ से तेजस्वी यादव, लोजपा के चिराग पासवान, पप्पू यादव, पुष्पम प्रिया चौधरी, उपेन्द्र कुशवाहा इत्यादि।
शुरुवात नीतीश कुमार से करते है पिछले चुनाव में राजद के साथ चुनाव लड़े किन्तु कालांतर में बीजेपी के साथ मिलकर राजद को दरकिनार कर सत्ता पे काबिज हुए। लालू यादव की जंगलराज,चारा घोटाले की कहानिया और परिवारवाद का सहारा लेकर बिहार की जनता को राजद के ख़िलाफ़ करने का पुर जोर कोशिश किया। नीतीश कुमार फिर उन्हीं मुद्दे को लेकर जनता के पास पहुंचे जिन मुद्दों को लेकर वे २००५ में सत्ता पे काबिज हुए थे, हालाकि इस दौरान उन्होंने अपने कार्यकाल की उपल्धियों को गिनाया, किन्तु जनता ने उनके पार्टी के प्रति उतनी सक्रियता नहीं दिखाई,इनके साथी बीजेपी भी मोदी जी के नाम पे वोट मांगते रहे। हालांकि नीतीश कुमार कई दफा अपने अल्पसख्यक वोटरों को रिझाने की कोशिश करते रहे किन्तु आदित्य योगीनाथ ने उनका खेल बिगाड़ दिया और जो कसर बाकी रह गई थी उसे ओवेसी ने पूरा कर दिया। जहां एक ओर तेजस्वी के १० लाख लोगों को रोज़गार देने की बात पे जदयू कहती फिरती थी कि ऐसा संभव नहीं है वहीं बीजेपी के १९ लाख लोगों को रोज़गार मुहैया कराने के चुनावी वादे पे चूपी साध ली। खैर जो भी हो बिहार में क्या झारखंड कि भांति एंटी एंकैंबंसी काम करेगी? ये तो कल ही पता चलेगा। वैसे बिहार में अगर नीतीश बाबू जीतेंगे भी तो जीत का फासला बेहद कम रहेगा।
वहीं बात नीतीश कुमार के प्रतिद्वेंदी की करे तो वे तेजस्वी यादव ही है जो नीतीश कुमार को कड़ी चुनौती दे रहे हैं, जहां नीतीश कुमार जंगलराज का भय दिखा कर और अपने कार्यकाल में हुए विकास योजनाओं का बखान कर लोगो को अपनी ओर आकर्षित करने का प्रयास कर रहे थे तो वहीं तेजस्वी यादव बिहार की जनता को बाढ़ , कोविद में हुए मजदूरों की परेशानियों को, और मुजफ्फरपुर बालिकागृह कांड, सृजन घोटाला का बखान कर निवर्तमान सरकार को घेरने की कोशिश करते रहे किन्तु इससे ज्यादा उन्होंने अपने हर भाषणों में पढ़ाई,दवाई और सिंचाई के साथ साथ रोजगार देने का वादा कर वोटरों को अपनी ओर आकर्षित करने का प्रयास करते रहे, यहीं कारण था कि युवाओं का रुझान इनकी और बढ़ता चला गया, इनकी सभावो में युवा जनता का ऐसा समर्थन मिला जिसे देख बीजेपी भी अपने घोषणा पत्र में १९ लाख लोगों को रोजगार देने की बात कही, फिर क्या तेजस्वी खुद १५-१९ सभा हर दिन करने लगे शायद उनको पता था कि विपक्ष के कम से कम १० हेलीकॉप्टर हवा में उड़ेगा यहीं कारण है कि उन्होंने एक ही हेलीकॉप्टर से १० हेलीकॉप्टरों की बराबरी करने की कोशिश की, मंच में अपने दल के प्रत्याशी को जीत का माला पहना कर जनता का आशीर्वाद मांगते हुए दूसरे सभा की ओर चल दिया करते थे। सभी साम्यवादी दल आईएनसी के साथ मिलकर महागठबंधन इस बार तेजस्वी यादव के नेतृत्व में सरकार बना रही है इस बात की पुष्टि समाचार चैनलों के सारे एग्जिट पोल के नतीजों ने कर दिया है फिर भी औपचारिक घोषणा अभी बाकी है। लालू यादव के बिना अगर तेजस्वी यादव ये चुनाव जीतते है तो ये उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि रहेगी।
अन्य मुख्यमंत्री प्रत्याशी की बात करे तो लोजपा के चिराग पासवान का नाम तीसरे नंबर पर आते है ये चुनाव उनके लिए दुखद रहा क्यों की प्रथम चरण के चुनाव के पूर्व ही ऊपर से उनके पिता का साया हमेशा के उठ गया इस वीसिम स्थिति में भी उन्होंने हार नहीं माना और जनता के बीच अपने प्रत्याशी के लिए वोट मांगने गए। किन्तु इस चुनाव में वे एनडीए गटक दल का सहभागी रहते हुए भी नीतीश कुमार के खिलाफ खुलेआम आलोचना करते नजर आए, खुद को मोदी जी का हनुमान बता कर बीजेपी प्रत्याशियों के पक्ष में वोट भी मांगा किंतु नीतीश कुमार के खिलाफ लगातार उनके सात निश्चय और नल जल योजना को घोटाले कि योजना बताते हुई नीतीश कुमार के ऊपर तीखे शब्दों से प्रहार करते रहे, हालाकि अभिनेता से नेता बने चिराग की सभाएं थोड़ी अच्छी थी किन्तु जमीनी स्तर पे शायद उनकी पार्टी उतनी मजबूत नहीं थी। आने वाले समय में चिराग तेजस्वी यादव का विकल्प हो सकते है। उनकी पार्टी भी झारखंड के क्षेत्रीय दल आजसू की तरह ही सत्ता दल के ख़िलाफ़ हो गई थी और इसका खामिजा बीजेपी को उठाना पड़ा था क्या यही हाल बीजेपी और जेडीयू को पुनः होगा?
इस कड़ी में अगले व्यक्ति है पप्पू यादव, पप्पू यादव जो कभी अपने बाहुबली छवि के लिए महशुर थे,किन्तु विगत कुछ सालो से उनके दरियादिली ,सेवा भाव से शायद हर एक बिहारी अवगत होगा चाहे वो पटना कि बाढ़ हो,चाहे मजदूरों को अनाज पहुंचने की बात हो ,फिर चाहे कोसी नदी में आया बाढ़ हो पप्पू यादव हर विकट परिस्थिति में बिहार की जनता के साथ खड़े रहे, किन्तु जमीनी स्तर पे पार्टी की पकड़ न रहने के कारण उनका मुख्यमंत्री बनने का सपना शायद धरा का धरा रह जाएगा।
पुष्पम प्रिया चौधरी :- अपने सुना होगा पोस्टर बाजी की सरकार जी हां बिल्कुल पुष्पम प्रिया चौधरी भी कुछ इसी अंदाज से बिहार की राजधानी में अपनी पहचान बनाई, फिर क्या था purals पार्टी बना कर खुद को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया, खैर नतीजा कुछ भी ही पुष्पम प्रिया चौधरी ने जिस काम अवधि में एक नेत्री के रूप में नाम कमाया है वह काबिलेतारिफ है अपने फोटो का मार्केटिंग करना कोई इनसे सीखे।
उपेन्द्र कुशवाहा कभी नीतीश कुमार के करीबी हुआ करते थे फिर राजद के साथ मिलकर चुनाव लड़ने का फैसला किया किन्तु जब सीटों पे सहमति नहीं बनी तो बीएसपी और AIMIM के साथ मिलकर खुद को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया खैर ये खुद चुनाव जीतेंगे या नहीं ये तो कल ही पता चलेगा।
बहरहाल नतीजा कुछ भी हो बिहार की जनता ने जिसे अपना मत दिया है उम्मीद करते है उनके जनप्रतिनिधि उनके आशा और उम्मीदों पे खड़ा उतरे। कभी कभी लगता है जिस प्रकार की राजनीतिक चेतना बिहार की जनता में है काश वो चेतना झारखंड की जनता में भी जागृत हो ताकि झारखंड में भी अच्छे नेता उभर के आए जो झारखंड के कायाकल्प को पलट दे।
So nice
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