मधुपुर का स्वर्णिम इतिहास कहीं दबे हुए हैं

 

यू तो झारखंड में बहुत कम ही इतिहासकार हुए जिन्होंने झारखंड के इतिहास के ऊपर विस्तार पूर्वक लिखा हो अगर किसी ने लिखा भी है तो उ नके विश्वसनीयता पे कई सारे प्रश्न किए जाते है। इतिहास लेखन के अभाव में आदिवासियों और सदानो के बीच उत्पन हुई नई संस्कृति, और दिकुओं के आगमन से शुरू हुई शोषण और संकट को विस्तार पूर्वक जानने में कोई लोगो कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। झारखंड के इतिहास के बारे में चर्चा को आगे बढ़ाते हुए आज चर्चा करेंगे मधुपुर की । मधुपुर देवघर जिले के अन्तर्गत आना वाला अनुमंडल है जहां कुछ दिनों में उपचुनाव होने वाला है , चुनावी पारा के चढ़ते ही राजनेता  मधुपुर के विकाश के लिए वादों की दरिया बहा दिया करते हैं, आज चर्चा मधुपुर के उस स्वर्णिम अतीत की करेंगे जिसे इतिहास के पन्नों में कई सालो तक दबोए रखा गया जी हां आज चर्चा मधुपुर के बंगाली बाबू मोशाय संस्कृति  की करेंगे, वहीं मधुपुर जिसके आबो हवा से खुश होकर १९७६ में आयी अनमोल परिकर जी द्वारा अभिनीत फिल्म चितचोर जिसे मधुपुर के ही राइटर्स द्वारा लिखा गया था जिसमें एक गाना था गौरी तेरा गांव तो बड़ा प्यारा मै तो गया मारा आ कर यहां रेे शायद लेखक मधुपुर के गांव की आबो हवा, यहां के वातावरण और हरियाली को चलचित्र के माध्यम से लोगो को अवगत कराना चाहते थे यहीं कारण होगा की फिल्म पूरा करने के बाद पूरा कास्ट मधुपुर का सैर करने आया था ।

मधुपुर जो आज अपनी अस्मिता को बरकरार रखने के लिए पुनः संघर्ष कर रहा है इस शहर की प्रासंगिकता से मधुपुर के आसपास में बसे हुए लोग भी अनजान है, एक समय था जब मधुपुर बंगाली ठात बाट के लिए जाना जाता था, एक समय था जब मधुपुर में सैकड़ों कोठियां हुआ करती थी जो अपने आप में  नायाब वास्तुकला का उदहारण पेश करती थी।एक समय था जब मधुपुर चोरों ओर  जंगलों से घिरा हुआ करती थीं, और गर्मियों के मौसम में ये क्षेत्र बंगाली सैलानियों का डेस्टिनेशन हुआ करता था।
आखिर कैसे मधुपुर बना कोठियों का शहर, वो वर्ष था १८५७ जब प्रथम स्वाधीनता आंदोलन से अंग्रेज़ी हुकूमत की नीव हिल गई थी, भारत के संसाधनों के तीव्र गति से दोहन और सैनिकों के  अविलंब लोकोमोशन के लिए तत्कालीन वायसराय लॉर्ड डलहौजी द्वारा रेलवे का जल पूरे देश में बिछाया गया, उन दिनों मधुपुर दिल्ली से कोलकात्ता वाया अंसानसोल रेलवे लाइन के  मुख्य मार्ग पे पड़ता था,और मधुपुर के शुद्ध वातावरण ने बाद में बंगाल से सैलानियों को अपनी ओर आकर्षित किया चुकीं उस समय बंगाल सत्ता का केंद्र हुआ करता था, और सारे सामाजिक राजनैतिक संगठनों में बंगाली का ही वार्चव था, ऐसे में बंगाल से लोगों का एक जगह से दूसरे स्थान पर आना जाना लगा रहता था, हालाकि जिस जंगलों कि अबो हवा ने सैलानियों को अपनी और खींचा था रेलवे निर्माण के समय इन्हीं जंगलों के स्लीपर्स रेलवे ट्रेक पर बैठाया गया था।
                                                    हालांकि बंगाल के लोगों का इस क्षेत्र में आगमन कोई नई बात नहीं थी पूर्व में भी ईश्वर चंद्र विद्यासागर मधुपुर से सटे कर्माटाड़ को अपना कार्य क्षेत्र बनाया था वहीं स्थाई बंदोबस्त के समय कई सारे बंगाली समुदाय के लोगो ने इस क्षेत्र में नीलाम हुए ज़मीन को खरीद कर जमींदार बन बैठे और इस प्रकार से मधुपुर में एक बंगाली संस्कृति का उद्भव हुआ, जो कालांतर में अपने प्रकाष्ता पे जा पहुंचा।१९ वीं सदी के प्रारंभ तक कई सारे बंगाली समुदाय के लोग देवघर, जसीडीह ,मधुपुर , करमाटाड इत्यादि बस चुके थे जहां राजनरायन बोस, कृष्ण कुमार मित्र, शिशिर कुमार घोष जैसे लोगो का आना जाना लगा रहता था किन्तु स्वदेशी आंदोलन के समय संथाल परगना के क्षेत्र में इन्हीं लोगों ने आंदोलन को बल दिया था, और रैडिकल आंदोलन से जुड़े हुए नेताओ के लिए ये क्षेत्र तो छिपने के लिए सबसे सटीक स्थान था, (यू पूरे आदिकाल से माध्यमिक और फिर आधुनिक काल तक झारखंड क्षेत्र कार्य को अंजाम देकर छुपने के लिए सबसे उपयुक्त स्थान हुआ करता था) अरविंद घोष के भाई वरिंद्र घोष जैसे क्रांतिकारी नेता देवघर के रोहिणी और मधुपुर में रहा करते थे वहीं असहयोग आंदोलन के समय महात्मा गांधी ने एक राष्ट्रीय स्कूल कि स्थापना और टाउन हॉल का उद्घाटन मधुपुर में करने के साथ ही युवा छात्रों को स्वदेशी अपनाने का संकल्प दिलवाया।बाद में दोबारा जब इनका पुनः आगमन हुआ तो सुद्रो को लेकर उन्होंने बाबा मंदिर में पंडा के भारी विरोध के बाद भी मंदिर परिसर में परिवेश करने में सफल रहे, बाद में देश के प्रथम रा्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद भी मधुपुर आए और उसी राष्ट्रीय स्कूल परिसर में ही रुके थे जिसका उद्घाटन महात्मा गांधी जी ने किया था और इसी प्रकार से लोगो का आना जाना मधुपुर में लगा रहा और देखते ही देखते गांवो में बसा मधुपुर शहर में तब्दील हो गया,यहां के पानी का भी एक विशेष महत्व हुआ करता था जो पेट की बीमारी को दूर कर देती थी और फिर बाद में रेल के माध्यम से कोलकात्ता तक पानी को के जाया जाने लगा। वर्तमान समय में भी कई मोहल्लों का नाम कोठियों पे ही है जैसे - कुदू बंगला, जहाज कोठी इत्यादि।किन्तु काल ने ऐसा करवट लिया की बंगाली बाबू मोसाय की संस्कृति  लकनवी, नवाबों वाली संस्कृति में तब्दील हो गई और बदलते समय के साथ मधुपुर भी अपनी प्रासंगिकता को भी खोने लगी। किन्तु आज ये सारे खोठीयो देख रेख रेख के अभाव में मृत्यप्राय हो गई है,ज़मीन के दलालों ने कई कोठियों को बेच डाला तो अतिक्रमण कर्मियों ने इसका अतिक्रमण कर डाला, अपनी बाबू मोशाय की संस्कृति को संजोए हुए कोठियां ए आज भी बंगाली समुदाय की गौरशाली इतिहास का गवाह है जिसने मधुपुर जैसे छोटे से क्षेत्र को इतिहास के पन्ने में स्थान दिया, कोठियों के मिटते वजूद ने यहां सैलानियों के आवागमन को भी प्रभावित किया है, आज समय है इन सारे कोठियों को फिर से पुनर्जीवित करने का, ताकि   फिर से हम लोग भी उस स्वर्णिम इतिहास के शाक्षी होने गौरव प्राप्त हो। लेकिन दुर्भा्य है कि मधुपुर चुनाव में कभी भी इन कोठियों को पर्यटकों के अनुरूप बनाने का संकल्प किसी भी राजनैतिक दलों द्वारा नहीं लिया जाता है । मधुपुर के कोठियों का वहीं हाल है जो देवघर में स्थित धर्मशालोओ का है, दोनों जगह ज़मीनें लूटी जा रही है और सरकार और प्रशासन मुक दर्शक बनी हुई है।


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