झारखंड की चुनावी गपशप:-
कल केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह जी रांची आ रहे है, यहां वे पार्टी कार्यकर्ताओ और नेताओ से मिलकर आगामी चुनाव हेतु रणनीति तय करेंगे, भाजपा के शीर्ष नेताओ ने दो एक पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान में केन्द्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान और असम के मख्यमंत्री हिमंत बिश्व शर्मा जी को झारखंड विधानसभा चुनाव का प्रभारी व सह प्रभारी नियुक्त किया है, दोनों लगातार राजधानी रांची और इसके आसपास के विधानसभा क्षेत्रों का दौरा कर रहे है,कभी कार्यकर्ताओ के घर में भोजन तो कभी राज्य स्तरीय नेताओ से भेट मुलाकात कर रहे है, दोनों के समक्ष पार्टी में हो रही अंदुरूनी गुटबाजी को रोकने के साथ ही रूठे हुए नेताओं को मानने और आगामी चुनाव हेतु हेमन्त सोरेन के रुप में किसी सशक्त नेता को सीएम के रुप में प्रोजेक्ट करना सबसे मुश्किल कार्य हो सकता है, जहां एक ओर भाजपा के एमपी vs एमएलए में दरारों की खबरें आज भी अखबारों की सुर्खियां बन रही है ऐसे में आपसी गीले सिकवे को दूर करना चुनौतीपूर्ण होने वाला है, प्रदेश भाजपा संथाल परगना में हो रहे लैंड जिहाद को लेकर मुखर हो रही है, हाल ही में बड़कागांव में बिगड़े सामाजिक सौहार्द को लेकर स्थानीय लोगों से असम के सीएम हजारीबाग के एमपी के संग मिले,साथ ही आदिवासियों की लुटती हुई ज़मीन, ब्लॉक में छाई कमीसूनखोरी को लेकर भी भाजपा मुखर होकर आवाज़ उठा रही है, सड़क पे भाजयुमो के नेता तो देख तो रहे है किंतु उसका व्यापक असर नज़र नही आ रहा है, वहीं एनडीए के घटक दल आजसू की बात करे तो ईचागढ़ से आजसू पार्टी के सुप्रीमो ने चुनावी विगुल फुक डाली है, वहीं प्रदेश की वर्तमान सरकार और उनके घटक दल नए मंत्रियो के स्वागत और पुराने सीएम से भेट मुलाकात में बिजी है, सहायक पुलिस आंदोलनरत है, पीजीटी टीजीटी का नियुक्ति पत्र तो काफी हो हंगामे के बाद बांटा गया, सरकार आने वाले समय में और नियुक्ति पत्र बांट सकती है, अब देखना ये होगा की इसका व्यापक असर कितना होगा, जहां एक ओर भाजपा अपनी कमियों को दूर करने, नेताओ को एकजुट करने, रणनीति बनाने में जुटी हुई है वहीं दूसरी ओर महागठबंधन हेमंत सोरेन जी के जेल से निकलने के बाद पूरे आत्मविश्वास से लबरेज है, हेमंत सोरेन और कल्पना सोरेन के रुप में जहां दो दो स्टार प्रचारक है तो वहीं लोकसभा चुनाव में बागियों से आजादी मिलने पे बिना संकोच से निर्णय लेने का सामर्थ्य भी इन्ही लोगो के पास है, किंतु ये भी सच्चाई है बीते पांच सालों में काम सिर्फ़ कागजों में हुआ, बड़ी बड़ी बाते भाषणों तक सीमित रही,जल खेतों तक नहीं पहुंच पाई, ज़मीन लूटती गई, जंगल उजड़ते रहे, हत्या लूटपाट, राजधानी में बढ़ी, युवाओं की आकांक्षा को पैरों तले रौंदा गया खैर अब चुनावी मौसम में बीते चार सालों की जैसी ही वायदे होंगे क्या जनता इस बार तीसरी विकल्प चुनेगी ये देखना दिलचास्ब होगा???
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