कोरोना के साथ अब एक और महामारी बनी सरकार की सिर दर्द

आज के समय में विश्व के ज्यादातर देश कोरोना महामारी से परेशान है, भारत में भी लगातार संक्रमितों की संख्या में इजाफा हो रहा है,अब देश में प्रवासी मजदूर कोरोंना कैरियर के रूप में देखे जा रहे है मजदूरों का पलायन जारी है, जिस रफ्तार से देश में कोरोना महामारी का प्रकोप बढ़ रहा है उसी रफ्तार से एक और महामारी इस देश में फैल रहा है जो अब केंद्र और राज्य सरकारों के लिए चिंता का विषय बन गया है, इस महामारी का नाम "अफवाह" है, वैसे ये महामारी कोई नई महामारी नहीं है यह महामारी भी कोरोना की भांति है जो लोगो में संक्रमण (फारवर्ड के माध्यम से) के माध्यम से फैल रहा है। संक्रमित लोगों द्वारा साझा किए जा रहे संदेशों को फॉरवर्ड करने वाले लोगों में भी लगातार इज़ाफ़ा हो रहा है जिससे गलत और अधूरी जानकारी पाने वाले लोगों में बढ़ोतरी हो रहा है। 
   प्रौद्योगिक के विकास के साथ साथ अफ़वाहों के फैलने की रफ़्तार भी बढ़ी है, वॉट्साप और फेसबुक के माध्यम से फॉरवर्ड और शेयर का ऑप्शन क्लिक करने मात्र से ही महज कुछ सेकंड में एक संदेश हजारों लोगो तक पहुंच जा रही है, यह अफवाह भी चैन की भांति फैल रही है जहां लोगो आगे शेयर किए हुए संदेशों को शेयर करके दूसरे लोगों तक गलत जानकारी पहुंचा रहे है। वॉट्सएप और फेसबुक वह यूनिवर्सिटी है जहां लोग अफ़वाह फैलने की दीक्षा लेते है और बिना अपने तार्किक क्षमता और संदेशों कि सत्यत्ता को जाने बगैर गलत संदेशों को शेयर कर देते है।
                     
*कोरोना काल में कैसे फैल रही है अफवाह*

यू तो करोना के प्रवेश करते ही व्हाट्सएप (कोरोना से संबधित) में मेसेजो की भरमार हो गईं थीं, रिश्तेदारों की मेसेज आते थे कि कैसे करे कोरोना से बचाव (मानो जैसे इन्हीं लोगो ने वैक्सीन बनाया हो) कुछ तथाकथित राजनीतिक दलों के नेताओं ने कहा था कि गोमूत्र पीने से कोरोना से मुक्ति मिल जाएगी,हमने देखा कि किस प्रकार से महज एक अफवाह फैलने के कारण दिल्ली यूपी बॉर्डर के पास हजारों की संख्या में मजदूर एकत्रित हो गए थे, जब नासा ने कहा था कि 29 अप्रैल को धरती के समीप से एक उल्कापिंड गुजरेगा तो यह खबर गांव के में अफवाह के तरफ फैली कि उल्का पिंड पृथ्वी से टकराने वाला है, मैंने लोगों को सही जानकारी देने की चेष्टा की किंतु वे लोग मानने को तैयार नहीं थे क्योंकि बहुमत उन लोगों का था जिनके पास गलत जानकारी थी जब मैंने अपनी बात रखी तो समान विचार वाले लोगों ने तुरंत अपनी गतबंधन की सरकार बना ली और अप्लमत में रहने के करना मुझे नेता प्रतिपक्ष बना दिया मैंने भी इस लोकतांत्रिक ढांचे का सम्मान करते हुए मौन रहना ही उचित समझा क्यों कि एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में जीत हमेशा जनादेश मिलने वालों की ही होती है वैसे लोकतंत्र प्रणाली में अधिकार है कि आप अपनी बातों को रख सकते हैं किंतु मैंने इस स्थिति में चुप रहना ही मुनासिब समझा क्यों कि मुझे भीड़ से डर लगता है।
                                                          अगर गौर से देखें तो अफवाहों को फैलने का मुख्य कारण अधूरी जानकारी है और कही न कही सरकार भी हमें अधूरी जानकारी देती है और अगर देती भी है तो लिखित में देती है जहा बेहद ही जटिल शब्दों में जानकारी लिखी होती है जो आम लोगो के बीच तक पहुंच नहीं पाती हैअगर राजनीतिक पार्टियां चुनाव के दौरान हर एक घरों तक पहुंच सकती है। पोस्टर एवं टेलीविजन के माध्यम से लोगों से जुड़ सकती है तो जब राजनीतिक दल के नेता सरकार बनती है तो क्यों नहीं वे लोगों तक हर एक जानकारी सही और सरल शब्दों में पहुंचती है, अधूरे जानकारी के कारण लोगों में संदेह और दुविधा उत्पन्न हो जाता है। उदाहरण के तौर पर अगर देखे तो जब महिलाओं के जनधन खाते में ₹500 भेजा गया तो यह अफवाह तेज़ी से फैली की अगर पैसों की निकासी जल्द से जल्द नहीं हुई तो सरकार पैसे वापस ले लेंगी जिसके चलते बैंकों में भीड़ लगना शुरू हो गया,
लॉकडॉउन के दौरान प्रवासी मजदूरों का विषय बेहद ही संवेदनशील रहा उन्हें उनके घर पहुंचने के लिए सरकार द्वारा ट्रेनों की व्यवस्था की गई और फोन के जरिए उनका ऑनलाइन रजि्ट्रेशन हुआ तो उन्हें लंबी अवधि के बाद घर जाने की खुशी से झूम उठे थे किन्तु ट्रेनों के परिचालन होने के संदेशों का देर से पहुंचने के कारण उनका सब्र का बांध टूट गया और कई लोग पैदल ही घर की तरफ चल दिए। सरकार इस मोर्चे पर भी विफल नजर आई वे लोगों को इस बात को बताने में असफल रहे ट्रेन चलने की जानकारी उनके द्वारा रजिस्टर नंबर में भेजी जाएगी और यहीं कारण था कि जब जब लोगों के पास फारवर्ड मेसेज आईं तो वे लोग बोरिया बिस्तर उठा कर स्टेशन की ओर अग्रसर हो गए और वहां पहुंच कर उन्हें पता चला कि यह जानकारी जूठी थी और दुविधा में पड़े रहे कई मजदूर पैदल ही चल दिए।
    
 अगर अफवाह फैलने के मूल कारणों की पड़ताल करें तो हम इस नतीजे पर पहुंचेंगे कि लोगों में एक प्रकार कि होड़ सी मची हुई है कि वे जानकारी को जल्दी से जल्दी अपने सगी संबधी के बीच साझा करें, और इस बढ़तीअवधि में वे लोग कई दाफा अधा अधूरा पढ़ कर जानकारी साझा कर देते है जो बाद में कई दफा अफवाह का शक्ल ले लेता है। बढ़ती हुई  अफवाहों के मद्देनजर, वॉट्सएप जैसे ऐप ने इसके ऊपर लगाम कसने के लिए फॉरवर्ड की संख्या सीमित कर दी है यहां तक कि ट्विटर जैसे ऐप मे फैक्ट चेक नामक एक अकाउंट बनाकर लोगों को सतर्क किया जा रहा है कि अफवाहों से बचें।कोरोना महामारी से हम आज नहीं तो कल मुक्ति पा लेंगे, किंतु अफवाह नामक महामारी से मुक्ति कब मिलेगी यह तो आने वाला समय ही बताएगा। वैसे अगली बार अगर आपके पास कोई फॉरवर्ड एज मैसेज आए तो उसे फॉरवर्ड करने से पहले उसकी सत्यता को जरूर जांच ले ताकि वह संदेश आगे जाकर अफवाह का सकल ना लेले।

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