पता नहीं क्या हुआ है
बहुत दिन हो गए है,अब न ही उस चांद का दीदार होता है
और ना ही होता है कोई नैन मैतका ।
पता नहीं क्या हुआ है,ऐसा प्रतीत होता है मानो की कॉलेज
परिसर में हर दिन किसी की कमी खल रही है।
पता नहीं अंतिम बार कब देखा था उसे,क्या मुझे याद है
वो क्षण हां याद है।
वह आ रही थी तेज़ी से जैसे मानो उसका अटेंडेंस शूट रहा हो
उसके आंखों में आंखें डालने की हिम्मत नहीं हुई क्यंकि मुझे डर लग रहा था कहीं मुझे ना आकर मार दे।
फिर भी मैंने देखा वह बड़ी ही तेज़ी से निकाल गई
तेज़ी से निकलने के क्रम में उसके बाल भी तेजी से लहराते हुए उसके
पीछे उड़ रहे थी मानो जैसे कि कहीं पीछे ना छूट जाए
उसके आगमन से ही प्रतीत हो रहा था कि वह अपने साथ कोई
आंधी तूफान को समेट कर आ रही है
शायद किसी बात का गुस्सा उसके जहन में था जो उसके चहरे के लालिमा को
फ़िका कर रहा था,पता नहीं क्या बात थी,मैंने जानने की कोशिश की किंतु अब और हिम्मत नहीं हुई कि जाकर पूछ लू
लगातार दो बार मिली नकामियाबी ने मुझे डारा दिया था और
फिर मै कैसे उससे पूछता किस मुंह से पूछता मैं डर गया था कि
अगर इस बार गया तो कहीं फ्लाइंग सैंडिल न रिसीव हो जाए
खेर वह पागल भी तो हर बार चुप ही रही उसको भी कुछ बोलना
चाइए था पर वह क्या बोलती? मासूम जो है🤗
कॉलेज की फिजाओं में अब और वह बाते नहीं रही जो
पहले हुआ करती थी,अब तो बस चारो और कोलाहल ही मचा
रहता है न कोई देखता है और न ही कोई देखती है
हर दिन कुछ मिसिंग सा रह जाता है अगले दिन की आस में हर दिन गुजर जाता है,
खेर यहीं तो नियति है प्रकृति में कुछ भी अस्थाई नहीं है,
आज जो है कल नहीं है अगर कुछ है तो खट्टी मीठी यादें,
जो आदमी को ये एहसास दिलाता है कि कुछ ग़लत हुए हैं
तुम्हारे साथ,खेर जो भी हो उसे जाने की जल्दी थी तो मैंने आंखो ही आंखो से उसे उसकी pg बिल्डिंग तक अपने आंखो से ही वहां तक छोर आया, इसी आशा में की कल फिर मिलेंगे।
शुभ प्रभात
और ना ही होता है कोई नैन मैतका ।
पता नहीं क्या हुआ है,ऐसा प्रतीत होता है मानो की कॉलेज
परिसर में हर दिन किसी की कमी खल रही है।
पता नहीं अंतिम बार कब देखा था उसे,क्या मुझे याद है
वो क्षण हां याद है।
वह आ रही थी तेज़ी से जैसे मानो उसका अटेंडेंस शूट रहा हो
उसके आंखों में आंखें डालने की हिम्मत नहीं हुई क्यंकि मुझे डर लग रहा था कहीं मुझे ना आकर मार दे।
फिर भी मैंने देखा वह बड़ी ही तेज़ी से निकाल गई
तेज़ी से निकलने के क्रम में उसके बाल भी तेजी से लहराते हुए उसके
पीछे उड़ रहे थी मानो जैसे कि कहीं पीछे ना छूट जाए
उसके आगमन से ही प्रतीत हो रहा था कि वह अपने साथ कोई
आंधी तूफान को समेट कर आ रही है
शायद किसी बात का गुस्सा उसके जहन में था जो उसके चहरे के लालिमा को
फ़िका कर रहा था,पता नहीं क्या बात थी,मैंने जानने की कोशिश की किंतु अब और हिम्मत नहीं हुई कि जाकर पूछ लू
लगातार दो बार मिली नकामियाबी ने मुझे डारा दिया था और
फिर मै कैसे उससे पूछता किस मुंह से पूछता मैं डर गया था कि
अगर इस बार गया तो कहीं फ्लाइंग सैंडिल न रिसीव हो जाए
खेर वह पागल भी तो हर बार चुप ही रही उसको भी कुछ बोलना
चाइए था पर वह क्या बोलती? मासूम जो है🤗
कॉलेज की फिजाओं में अब और वह बाते नहीं रही जो
पहले हुआ करती थी,अब तो बस चारो और कोलाहल ही मचा
रहता है न कोई देखता है और न ही कोई देखती है
हर दिन कुछ मिसिंग सा रह जाता है अगले दिन की आस में हर दिन गुजर जाता है,
खेर यहीं तो नियति है प्रकृति में कुछ भी अस्थाई नहीं है,
आज जो है कल नहीं है अगर कुछ है तो खट्टी मीठी यादें,
जो आदमी को ये एहसास दिलाता है कि कुछ ग़लत हुए हैं
तुम्हारे साथ,खेर जो भी हो उसे जाने की जल्दी थी तो मैंने आंखो ही आंखो से उसे उसकी pg बिल्डिंग तक अपने आंखो से ही वहां तक छोर आया, इसी आशा में की कल फिर मिलेंगे।
शुभ प्रभात
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